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देवी ध्यानम्

कालीध्यानम् शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम् । चतुर्भुजां खड्गमुण्डवराभयकरां शिवाम् ।। मुण्डमालाधरां देवीं लोलजिह्वां दिगम्बराम् । एवं सञ्चितयत्कालीं श्मशानालयवासिनीम् ! ताराध्यानम् प्रत्यालीढपदापितांघ्रिशव हृद्घोराट्टहासापरा । खड्गेंदीवरकत्रिखरभुजा हुंकारबीजोद्भवा ॥ खर्वानीलविशालपिङ्गलजटाजूटैकनागैर्युता । जाड्यं चन्द्रकपालकर्तृजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयम् ॥ षोडशीध्यानम् बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् । पाशांकुशशरांश्चापं धारयन्तीं शिवां भजे ॥ भुवनेश्वरीध्यानम् । उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदांकुशपाशभीतिकरां प्रथये भुवनेशीम् ॥ भैरवीध्यानम् उद्यद्भानु सहस्त्र कान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकाम् । रक्तालिप्तपयोधरा जपपटीं विद्यामभीतिं वराम् ॥ हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्रक्तारविन्दश्रियम् । देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्दे सुमन्दस्मिताम् ॥ छिन्नमस्ताध्यानम् प्रत्यालीढपदां सदैव दधतीं छिन्नं शिरः कत्रिकाम् । दिग्वस्त्रां स्वकबन्धशोणितसुधाधारां पिबन्ती मुदा ।। नागाबद्धशिरोर्माण त्रिनयनां हृद्युत्पलालंकृताम् । रत्यासक्तमनोभवोपरि दृ...

धूमावतीध्यानम्

धूमावतीध्यानम् विवर्णा चचञ्ला दुष्टा दीर्घा च मलिनाम्बरा । विमुक्तकुन्तला रूक्षा विधवा विरलद्विजा । काकध्वजरथारूढा विलम्बितपयोधरा । शूर्पहस्तातिरूक्षाक्षा धूतहस्ता वरान्विता ॥ प्रवृद्धघोणा तु भृशं कुटिला कुटिलेक्षणा । क्षुत्पिपासाद्दिता नित्यं भयदा कलहास्पदा ।। जपेत्कृष्णचतुर्दश्यां पुरश्चरणसिद्धये ।। बगलामुखीध्यानम् ॥ मध्येसुधाब्धिमणिमण्डपरत्नवेदीसिंहासनोपरिगतां परि- पीतवर्णाम् । पीताम्बराभरणमालविभूषिताङ्गीं देवीं नमामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वाम् || जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं वामेन शत्रून् परपीडयन्तीम् । गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढचा द्विभुजां नमामि ॥ मातंगीध्यानम् । श्यामाङ्गीं शशिशेखरां त्रिनयनां रत्नसिंहासनस्थिताम् । वेदैर्बाहुदण्डैर सिखेटकपाशाङ्क ुशधराम् ॥ कमलाध्यानम् कान्त्या काञ्चनसन्निभां हिमगिरिप्रख्यैश्चतुभिर्गजैः । हस्तोत्क्षिप्त हिरण्मयामृतघटैरा सिच्यमानांश्रियम् ॥ बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममक्षयं हस्तैः किरीटोज्वलाम् । क्षौमाबद्धनितम्बबिम्बललितां वन्देऽरविन्दस्थिताम् ॥

विद्युज्जिह्वा यक्षिणी साधना और चामुण्डा यक्षिणी साधना

विद्युज्जिह्वा यक्षिणी साधना 'विद्युज्जिह्वा' यक्षिणी का साधना-मन्त्र नीचे प्रस्तुत है-. ॐ कारमुखे विद्युज्जिह्वा ॐ हुं चेटके जय जय स्वाहा। साधना विधि- वटवृक्ष के नीचे बैठकर उक्त मन्त्र का 108 बार जप करके थोड़े मिष्टान्न एवं भोजन की बलि दें। इस विधि से नित्य एक मास तक निरन्तर साधना करते रहने पर 'विद्युज्जिह्वा' यक्षिणी प्रकट होती हैं। वे साधक के हाथ से स्वयं भोजन ग्रहण करके यह वर देती हैं कि मैं सदैव तुम्हारे समीप बनी रहूंगी।साथ ही वे साधक को भूत, भविष्य एवं वर्तमान तीनों काल की बातें भी बताती रहती हैं। चामुण्डा यक्षिणी साधना 'चामुण्डा' यक्षिणी का साधना-मन्त्र इस प्रकार है- ॐ क्रीं आगच्छ आगच्छ चामुण्डे श्रीं स्वाहा। साधना विधि-मिट्टी तथा गोबर से पृथ्वी को लीपकर उस पर कुशा बिछा दें। तत्पश्चात् पंचोपचार एवं नैवेद्य द्वारा देवी का पूजन कर, रुद्राक्ष की माला पर उक्त मन्त्र का एक लाख बार जप करें। इससे 'चामुण्डा' यक्षिणी प्रसन्न होकर, अर्द्धरात्रि में सोते समय स्वप्न में साधक को सभी शुभाशुभ फल बता देती हैं।

चिञ्चि पिशाची यक्षिणी साधना और कर्णपिशाचिनी' यक्षिणी

चिञ्चि पिशाची यक्षिणी साधना 'चिञ्चि पिशाची' नामक यक्षिणी का साधना-मन्त्र इस प्रकार है- ॐ क्रीं चिञ्चि पिशाचिनी स्वाहा। साधना विधि- नीलवर्ण के भोजपत्र पर केसर, गोरोचन तथा दूध के मिश्रण से अष्टदल कमल का निर्माण कर, प्रत्येक दल में मायाबीज लिखें। लेखनोपरान्त उक्त यन्त्र को मस्तक पर धारणकर यथाशक्ति संख्या में पूर्वोक्त मन्त्र का जप करें। उक्त विधि द्वारा सात दिन तक यत्नपूर्वक जप करते रहने से 'चिञ्चि पिशाची' यक्षिणी साधक पर प्रसन्न होकर उसे स्वप्न में भूत, भविष्य तथा वर्तमान के सभी वृत्तान्त बता देती है! कर्णपिशाचिनी' यक्षिणी का साधना-मन्त्र नीचे दिया जा रहा है- ॐ ह्रीं चः चः कम्बलके गत्या पिण्डं पिशाचिके स्वाहा। साधना विधि -प्रतिदिन सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय इस मन्त्र का 1008 की संख्या में 21 दिनों तक जप करें तथा सन्ध्या के समय अपने आहार में से एक पिण्ड छत के ऊपर फेंक दें। इस कृत्य से 'कर्णपिशाचिनी' यक्षिणी प्रसन्न होकर साधक की शय्या पर आती हैं तथा उसे प्रतिदिन 25 स्वर्ण मुद्राएं देकर, उसके प्रत्येक प्रश्न का उत्तर कान में बताती रहती हैं।

लक्ष्मी कुबेर साधना

लक्ष्मी कुबेर साधना दीपावली हमारे जीवन मे बहुत महत्व रखती है इस दिन किसी भी साधना की शुरूवात करना फलदायी होता है मे एक साधना बता रहा हू जिसके करने से आपको धन की समस्याओ से निजात मिल जायेगी ये साधना धन प्राप्ति के लिये की जाती है यह साधना तीन दिन की है यदि साधना को लगातार 40 दिन करते है  तो सुख समृद्धि हमेशा बनी रहती है इसके द्वारा मेने कई लोगो के जीवन मे धन की परेशानी खतम की है आज वो सम्पन्न जीवन जी रहे है दिन - धनतेरस, दीवाली, पूर्णमासी, शुक्रवार दिन जाप -03 दिन या 7, 11, 21, 40 समय - रात 10 बजे से या सुबह 7 बजे से वस्त्र - सफेद आसन - लाल माला - कमलगट्टे या स्फेटिक जाप - 11 माला कुबेर मंत्र ,21 माला लक्ष्मी मंत्र रोज दिशा -  पश्चिम मुख पूजन - पंचोपचार कवच प्रयोग - नही पूजन - गुरू, गणेश , इस्ट, कुल देव , पितर ,स्थान देव, लक्ष्मी जी, कुबेर जी (नित्य का पूजन साधना से पहले अलग से कर लें ) भोग - भोग मे खीर ,मिठाई केसर डालकर साधना विधि यह साधना धन त्रयोदशी से प्रारम्भ होती है  दीवाली की रात को सम्पन्न होती है  इसे  7. , 11 , 21 या 40 दिन तक लगातार कर सकते है ज...

Punishments in Garud Purana's Narakas

गरुड़ पुराण के अनुसार नरक में प्राणी को उसके पापों के अनुसार अलग‑अलग प्रकार की सजा मिलती है। सामान्य रूप से धन‑हिंसा, व्यभिचार, झूठ, क्रूरता और अधर्म से जुड़े कर्मों के लिए विशेष नरक बताए गए हैं।गरुड़ पुराण में नरक की संख्यागरुड़ पुराण में मुख्य रूप से 28 प्रकार के नरक (नरक लोक / नारक) का वर्णन मिलता है, कुछ परंपराएँ इन्हें 36 तक मानती हैं।इन नरकों में भेजने वाला यमराज है, जो जीव के कर्मों के आधार पर निर्णय करता है।कुछ प्रमुख नरक और पापतमिस्रम: जो दूसरे का धन, संतान या स्त्री का हरण करता है, उसे बाँधकर घोर कोड़े मारे जाते हैं, बार‑बार बेहोश होकर फिर होश में लाया जाता है।अन्धतमिस्रम: पति‑पत्नी में छल, बेवफाई, पर‑स्त्री/पर‑पुरुष गमन आदि के लिए अंधकार और मार‑पीट से भरा नरक कुम्भीपाकम्: जो जीव‑हत्या करते हैं या निःदोष प्राणियों को कष्ट देकर मारते हैं, उन्हें खौलते तेल के कड़ाहों में डाला जाता है।कालसूत्रम्: जो बुजुर्गों और कर्तव्यनिष्ठ बड़ों का अपमान करते हैं, उन्हें जलती भूमि और असह्य ताप में दौड़ाया जाता है।साल्मली: व्यभिचार और पर‑स्त्री गमन करने वाले पुरुष‑स्त्रियों को तपते लोहे की मूर्...

श्री महाविपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्रम

श्री महाविपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्रम मां प्रत्यंगिरा का भद्रकाली या महाकाली का ही विराट रूप है। मां प्रत्यंगिरा की गुप्तरूप से की गई आराधना, जप से अच्छों अच्छों के झक्के छूट जाते हैं। कितना ही बड़ा काम क्यों न हो अथवा कितना बड़ा शत्रु ही क्यों न हो, सभी का मां चुटकियों में शमन कर देती हैं। प्रत्यक्ष शत्रु से निपटना आसान होता है किन्तु हमारे कई अप्रत्यक्ष शत्रु होते हैं जो सामने मित्रता पूर्ण व्यवहार रखते हैं किन्तु हमारे पीठ पीछे हमे नुकसान पहुंचाते हैं व हमारी छवि बिगाड़ते रहते हैं, और हमारे परिवार के सदस्यो पर अपनी शत्रुता निकालते हैं। ऐंसे शत्रुओं पर यह मारण प्रयोग करने पर सिर्फ शत्रु ही नहीं बल्कि उसके परिवार के सदस्य पर भी प्रभाव होता है। ऐसे समस्त शत्रुओं पर यह तांत्रिक प्रयोग करें । स्तोत्रम प्रारंभ करने से पूर्व प्रथम पूज्य श्रीगणेश, भगवान शंकर पार्वती, गुरुदेव, मां सरस्वती, गायत्रीदेवी, भगवान सूर्यदेव, इष्टदेव, कुलदेव तथा कुलदेवी का ध्यान अवश्य कर लें। यह स्तोत्र रात्रि 10 बजे से 2 के मध्य किया जाए तो तत्काल फल देता है। नमस्कार मन्त्रः श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा काल्यै नमः। पूर्...

प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम्

प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् अस्य श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रस्य, अङ्गिरा ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीप्रत्यङ्गिरा देवता ओं बीजं शक्तिः ममाभीष्ट सिध्यर्थे पाठे विनियोगः । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः षडङ्गन्यासं कुर्यात् । ध्यानम् - कृष्णरूपां बृहद्रूपां रक्तकुञ्चिता मूर्द्धजाम् । शिरः कपालमालाञ्च विकेशीं घूर्णिताननाम् ॥ रक्तनेत्रामति क्रुद्धां लम्बजिह्वामधोमुखीम् । दंष्ट्राकरालवदनां नेत्र भ्रुकुटिलेक्षणाम् ॥ ऊर्ध्वदक्षिणहस्तेन विभ्रतीं च परष्यधम् ॥ अघोदक्षिणहस्तेन विभ्राणां शूलमद्भुतम् । ततोर्ध्ववामहस्तेन धारयन्तीं महाङ्कुशाम् । अधोवाम करेणाथ विभ्राणां पाशमेव च । एवं ध्यात्वा महाकृत्यां स्तोत्रमेतदुदीरयेत् ॥ ईश्वर उवाच - नमः प्रत्यङ्गिरे देवि प्रतिकूलविधायिनि । नमः सर्वगते शान्ते परचक्रविमर्दिनी ॥ नमो जगत्रयाधारे परमन्त्रविदारिणी । नमस्ते चण्डिके चण्डी महामहिषवाहिनी ॥ नमो ब्रह्माणि देवेशि रक्तबीजनिपातिनी । नमः कौमारिके कुण्ठी परदर्पनिषूदिनी ॥ नमो वाराहि चैन्द्राणि परे निर्वाणदायिनी । नमस्ते देवि चामुण्डे चण्डमुण्डविदारिणी ॥ नमो मातर्महालक्ष्मी संसारार्णवतारिणी । निशुम्भदैत्यसंहार...

Disclaimer

Disclaimer Last updated: September 21, 2025 Interpretation and Definitions Interpretation The words of which the initial letter is capitalized have meanings defined under the following conditions. The following definitions shall have the same meaning regardless of whether they appear in singular or in plural. Definitions For the purposes of this Disclaimer: Company (referred to as either "the Company", "We", "Us" or "Our" in this Disclaimer) refers to Magical Healing ** A divine truth". Service refers to the Website. You means the individual accessing the Service, or the company, or other legal entity on behalf of which such individual is accessing or using the Service, as applicable. Website refers to Magical Healing ** A divine truth", accessible from https://itsmagicalhealing.blogspot.com/ Disclaimer The information contained on the Service is for general information purposes only. The Company assumes no responsibi...

पुतली वशीकरण क्या है? परिभाषा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 पुतली वशीकरण क्या है? -  परिभाषा  और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि परिभाषा पुतली वशीकरण एक तांत्रिक क्रिया है, जिसमें एक प्रतीकात्मक "पुतली" को माध्यम बनाकर किसी विशेष व्यक्ति के मन, भावनाओं या निर्णयों पर प्रभाव डाला जाता है। यह प्रभाव एक मंत्रित प्रक्रिया द्वारा डाला जाता है, जिसमें संकल्प, साधना, मंत्रोच्चारण और तांत्रिक विधि का समावेश होता है। यह विधि इस धारणा पर आधारित है कि किसी वस्तु (यहाँ पुतली) को जब किसी व्यक्ति के प्रतिनिधित्व में उपयोग किया जाए, तो उस वस्तु पर किया गया ऊर्जा-प्रभाव सीधे उस व्यक्ति पर असर करता है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान में "symbolic representation with energy transference" की संज्ञा दी जा सकती है, जबकि तांत्रिक परंपरा इसे "प्रतीकात्मक शक्ति संचरण (Symbolic Power Transference)" मानती है। 9 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारतवर्ष में तंत्र विद्या वैदिक काल से भी पुरानी मानी जाती है। जहाँ वेदों में यज्ञ और मंत्रों के माध्यम से देवताओं का आवाहन होता था, वहीं तंत्र में प्राकृतिक शक्तियों को साधक की इच्छानुसार प्रभावित करने की विधियाँ विकसित हुईं।  पुतली क...